
देहरादून। गंभीर बीमारी से जूझ रहे 17 वर्षीय अभिजीत की जिंदगी बचाने में चिकित्सा टीम के उपचार के साथ समाजसेवी मोहन खत्री की मानवीय पहल भी महत्वपूर्ण साबित हुई। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से ताल्लुक रखने वाले अभिजीत के इलाज के दौरान जब परिवार महंगी दवाइयों और उपचार के खर्च से जूझ रहा था, तब मोहन खत्री ने आगे बढ़कर उसकी मदद की।
मूल रूप से सुंदरनगर, जमशेदपुर (पूर्वी सिंहभूम, झारखंड) निवासी अभिजीत की हालत उस समय बेहद गंभीर हो गई थी, जब उसके प्लेटलेट्स काफी कम हो गए। परिवार इलाज के लिए हरिद्वार जिला अस्पताल, रुड़की, एम्स ऋषिकेश, जॉली ग्रांट और इंडेश अस्पताल तक भटकता रहा। अभिजीत के पिता देवनाथ होटल में काम करते हैं और इसी आय से परिवार का पालन-पोषण करते हैं। ऐसे में महंगे इलाज का खर्च उठाना परिवार के लिए बेहद मुश्किल हो गया था।
मुश्किल वक्त में मदद के लिए आगे आए मोहन खत्री
परिवार की आर्थिक स्थिति और अभिजीत की गंभीर हालत की जानकारी मिलने पर समाजसेवी मोहन खत्री ने मदद का हाथ बढ़ाया। NEBA Care Foundation के माध्यम से उन्होंने करीब 40 हजार रुपये की जीवनरक्षक दवाइयां और आवश्यक मेडिकल सामग्री नि:शुल्क उपलब्ध कराई। इसके साथ ही उपचार के दौरान परिवार को लगातार सहयोग और हौसला भी दिया।
अभिजीत का उपचार दून अस्पताल में डॉ. अशोक और उनकी टीम की निगरानी में हुआ। अस्पताल के चिकित्सकों और स्टाफ की मेहनत, समय पर मिले उपचार तथा करीब 30 दिनों तक ICU में चले इलाज के बाद अभिजीत की हालत में सुधार हुआ है। फिलहाल वह ICU से निकलकर जनरल वार्ड में पहुंच चुका है और उसकी स्थिति में लगातार सुधार बताया जा रहा है।
30 वर्षों से समाजसेवा में सक्रिय हैं मोहन खत्री
समाजसेवी मोहन खत्री लंबे समय से समाजसेवा के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वह करीब 30 वर्षों से रेड क्रॉस सोसाइटी से जुड़े हुए हैं और पिछले पांच वर्षों से कोषाध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। उत्तराखंड राज्य आंदोलन में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही है।
इसके अलावा मोहन खत्री अब तक करीब 150 रक्तदान शिविरों के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं। जरूरतमंदों की मदद और सेवा कार्यों के चलते स्थानीय लोग उन्हें स्नेह से “मामा” के नाम से भी जानते हैं।
अभिजीत के कठिन समय में की गई इस मदद को स्थानीय स्तर पर इंसानियत और समाजसेवा की एक मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है। इस घटना ने यह संदेश भी दिया है कि संकट की घड़ी में यदि समाज के सक्षम लोग जरूरतमंद परिवारों का हाथ थामें, तो कठिन परिस्थितियों में भी उम्मीद की नई किरण पैदा की जा सकती है।



